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आज है हलषष्ठी, जानिए इस व्रत की कथा

Hal Shashti 2021 VRAT KATHA

आज हलषष्ठी का पर्व मनाया जा रहा है. यह पर्व भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन मनाया जाता है. वैसे हलषष्ठी को विभिन्न स्थानों पर हलछठ, हरछठ व्रत, चंदन छठ, तिनछठी, तिन्नी छठ, ललही छठ, कमर छठ, अथवा खमर छठ आदि के नामों से भी जाना जाता है. कई पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था. ऐसे में इस दिन महिलाएं अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं. अब आज हम आपको बताते हैं आखिर क्यों करते हैं हलछठ का व्रत.

हलषष्ठी व्रत कथा

प्राचीनकाल में एक ग्वालन प्रसव पीड़ा से व्याकुल थी, लेकिन वह अपनी गाय का दूध-दही भी बेचने जाना चाहती थी. वह सोच रही थी कि अगर उसका प्रसव हो गया तो उसका दूध-दही घर पर ही पड़ा रह जायेगा. हिम्मत करके वह दूध-दही सर पर रखकर पास के गांव में बेचने चली गई. संयोगवश उसी दिन हलषष्ठी थी. उसने अपने छोटे से बच्चे को एक गांव के करीब एक झरबेरी के पेड़ के नीचे सुलाकर गांव में गाय भैंस के मिश्रित दूध को भैंस का दूध बताकर बेच दिया. उसके ऐसा करते ही झरबेरी के पेड़ के पास खेत जोत रहे किसान के बैल अचानक भड़क कर भागे तो हल का फल बच्चे के शरीर में घुस जाने से बच्चे की मृत्यु हो गयी. इससे किसान दुखी हो गया. उसने साहस से काम लेते हुए बच्चे के फटे पेट में झरबेरी के कांटों से टांके लगाए और घर चला गया.

कुछ देर बाद ग्वालिन दूध-दही बेचकर वहां आयी तो बच्चे की स्थिति देखते ही समझ गयी कि उसके पापों की सजा उसके बच्चे को मिली है. उसने सोचा कि उसकी गलत नियति से उपवासी स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट हुआ है. उसने अपने कृत्य का प्रायश्चित करने के लिए बच्चे को वहीं छोड़, उन गलियों में गई, जहां उसने दूध-दही बेचा था, वह घूम-घूम कर सबसे कहने लगी कि उससे अपराध हुआ है, उसकी करनी का दण्ड उसे मिलना ही चाहिए. तब उपवासी स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ की भावना से उसे क्षमा तो किया ही साथ ही आशीर्वाद भी दिया. उपवासी स्त्रियों का आशीर्वाद लेकर जब वह झरबरी के पेड़ के नीचे पहुंची तो उसका पुत्र जीवित अवस्था में मिला, तभी से उसने कभी भी झूठ नहीं बोलने की कसम खाई.

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